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” सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता ” गतांक से आगे- (284) सत्रहवाँ अध्याय : श्रद्धात्रयविभागयोग श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरै:। अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तै: सात्त्विकं परिचक्षते ।।17।।

भौतिक लाभ की इच्छा न करने वाले तथा परमेश्वर में प्रवृत्त मनुष्यों द्वारा दिव्य श्रद्धा से सम्पन्न यह तीन प्रकार की तपस्या सात्त्विक तपस्या कहलाती है। सज्जनों, धर्म और अध्यात्म में श्रद्धा के बहुुत मायने हैं, श्रद्धा के बाद ही सारी चीजें हैं, भगवान् के मन्दिर में गये, मगर श्रद्धा …

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जन मानस रमेन्द्र पाण्डेय मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का परम पावन जीवन चरित्र आदि कवि महर्षि बाल्मीकि एवं गोसाईं तुलसी दास जी के साथ ही अनेक भक्तों कवि साहित्यकार लेखक और समालोचक समीक्षक विद्वानों ने विभिन्न विधाओं में लिखा व गाया तथा विस्तार से प्रकाश डाला है ।

जन मानस सदैव प्रासंगिक राम चरित की ही सरल सहज सामान्य प्रस्तुति है। सुदृढ़ पिनाक तोड़ने में पा लिया, अमित विक्रम जय। विजय ध्वनि के साथ हो गया, शौर्य शुल्क का परिणय।। महातेज – सामुख्य शुल्क में, विष्णु शक्ति को पाया। अस्त्र – शस्त्र सम्पन्न आर्य, नेता अयोध्य पुर आया।। …

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” सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता गतांक से आगे- सत्रहवाँ अध्याय : श्रद्धात्रयविभागयोग देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्‌। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ।।14।।

परमेश्वर, ब्राह्मण, गुरु, माता-पिता की पूजा करना तथा पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा ही शारीरिक तपस्या हैं। सज्जनों, यहाँ पर भगवान् तपस्या के भेद बताते हैं, सर्वप्रथम वे शारीरिक तपस्या का वर्णन करते हैं, मनुष्य को चाहिये कि वह ईश्वर या देवों, योग्य ब्राह्मणों, गुरु तथा माता-पिता जैसे गुरुजनों या …

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जन मानस रमेन्द्र पाण्डेय मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अवतरण देश भारत में प्रागैतिहासिक काल से ही आर्य-अनार्य दोनों रहते आए हैं।

जिन अनार्यों ने आर्य सभ्यता स्वीकार की वे वानर हुए। आर्यों का विशेष आधिपत्यं उत्तर व अनार्यों का दक्षिण की ओर था जबकि बानर मध्यवर्ती क्षेत्र में रहते थे। विद्या का गुण प्रतिभा और दोष मिथ्याहंकार है। विद्या – बुद्धि का संतुलन मनुष्य को देवता और असंतुलन असुर बनाता है। …

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” सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता ” गतांक से आगे – (282) सत्रहवाँ अध्याय : श्रद्धात्रयविभागयोग अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्‌। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्‌ ।।12।। विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्‌। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ।।13।।

लेकिन हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ किसी भौतिक लाभ के लिये या गर्ववश किया जाता है, उसे तुम राजसी जानो और जो यज्ञ शास्त्र के निर्देशों की अवहेलना करके, प्रसाद वितरण किये बिना, वैदिक मन्त्रों का उच्चारण किये बिना, पुरोहितों को दक्षिणा दिये बिना तथा श्रद्धा के बिना सम्पन्न किया जाता …

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*गुप्तनवरात्री 13 से 21 जुलाई विशेष* 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से दस महाविद्याओं की उपासना का पर्व ‘गुप्त नवरात्र’ मनाया जाता है। गुप्त नवरात्रि कल यानी 13 जुलाई से प्रारम्भ हो रहे हैं। आषाढ़ के गुप्त नवरात्रि का शुभारंभ पुष्य नक्षत्र और शुक्रवार के दिन से हो रहा है। शुक्रवार देवी जी का …

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*क्यों पड़ते है श्री जगन्नाथ भगवान प्रत्येक वर्ष बीमार*

उड़ीसा प्रान्त में जगन्नाथ पूरी में एक भक्त रहते थे , श्री माधव दास जी अकेले रहते थे, संसार से इनका लेना देना नही था। अकेले बैठे बैठे भजन किया करते थे, नित्य प्रति श्री जगन्नाथ प्रभु का दर्शन करते थे और उन्ही को अपना सखा मानते थे, प्रभु के …

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” सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता ” गतांक से आगे – (282) सत्रहवाँ अध्याय : श्रद्धात्रयविभागयोग अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्‌। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्‌ ।।12।। विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्‌। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ।।13।।

लेकिन हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ किसी भौतिक लाभ के लिये या गर्ववश किया जाता है, उसे तुम राजसी जानो और जो यज्ञ शास्त्र के निर्देशों की अवहेलना करके, प्रसाद वितरण किये बिना, वैदिक मन्त्रों का उच्चारण किये बिना, पुरोहितों को दक्षिणा दिये बिना तथा श्रद्धा के बिना सम्पन्न किया जाता …

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जन मानस रमेन्द्र पाण्डेय मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने विवाह पश्चात वन यात्रा काल तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अध्ययन जारी रखा।

वनवास के दौरान चिंता से दशरथ जी कह उठे थे कि अभी तक राम वेदों के अध्ययन से, ब्रह्मचर्य के संयम-नियम से तथा विभिन्न गुरुओं की अधीनता से कृश होते रहे हैं, और जब उनके राज्याभिषेक बाद सुख भोगने का समय आया तब उन्हें फिर वनवास के कष्ट पूर्ण जीवन …

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गीता रहस्य – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

स्वामी रामस्वरूप भगवद्गीता को लिखे लगभग 5,3000 वर्ष हो चुके हैं, परंतु वेद तो सबसे पुरातन हैं।  वेदों से ही पृथ्वी पर आज तक ज्ञान गंगा बह रही है।  वेद स्वतः प्रमाण हैं। अतः वेदों के अनुसार आज भी जो धार्मिक ग्रंथों में ज्ञान है, वह सत्य है… गतांक से आगे… 8,64,000 वर्षों का एक द्वापर युग एवं 4,32, 00 वर्षोें का एक कलियुग होता है। इस प्रकार चारों युगों के समय की गणना 4,32, 20, 000 वर्ष की है ज

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