Home >>> धर्म >>> ” सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता ” गतांक से आगे – अध्याय सप्तम : ज्ञानविज्ञानयोग (भगवद्ज्ञान) रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ।।8।।

” सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता ” गतांक से आगे – अध्याय सप्तम : ज्ञानविज्ञानयोग (भगवद्ज्ञान) रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ।।8।।

हे कुन्तीपुत्र! मैं जल का स्वाद हूंँ, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हूंँ, वैदिक मन्त्रों में ओंकार हूंँ, आकाश में ध्वनि हूंँ तथा मनुष्य में सामर्थ्य हूंँ।

सज्जनों, यह श्लोक बताता है कि भगवान् किस प्रकार अपनी विविध परा तथा अपरा शक्तियों द्वारा सर्वव्यापी है, परमेश्वर की प्रारम्भिक अनुभूति उनकी विभिन्न शक्तियों द्वारा हो सकती है और इस प्रकार उनका निराकार रूप में अनुभव होता है, जिस प्रकार सूर्यदेवता एक पुरूष है और अपनी सर्वव्यापी शक्ति सूर्यप्रकाश द्वारा अनुभव किया जाता है, उसी प्रकार भगवान् अपने धाम में रहते हुये भी अपनी सर्वव्यापी शक्तियों द्वारा अनुभव किये जाते हैं।

जल का स्वाद जल का मूलभूत गुण है, कोई भी व्यक्ति समुद्र का जल नहीं पीना चाहता क्योंकि इसमें शुद्ध जल के स्वाद के साथ नमक मिला रहता है, जल के प्रति आकर्षण का कारण स्वाद की शुद्धि है और यह शुद्ध स्वाद भगवान् की शक्तियों में से एक है, निर्विशेषवादी व्यक्ति जल में भगवान् की उपस्थिति जल के स्वाद के कारण अनुभव करता है और सगुणवादी भगवान् का गुणगान करता है, क्योंकि वे प्यास बुझाने के लिये सुस्वादु जल प्रदान करते हैं, परमेश्वर को अनुभव करने की यही विधि है।

व्यवहारतः सगुणवाद तथा निर्विशेषवाद में कोई मतभेद नहीं है, जो ईश्वर को जानता है वह यह भी जानता है कि प्रत्येक वस्तु में एकसाथ सगुणबोध तथा निर्गनबोध निहित होता है और इनमें कोई विरोध नहीं है, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश भी मूलतः ब्रह्मज्योति से निकलता है जो भगवान् का निर्विशेष प्रकाश है, प्रणव या ओंकार प्रत्येक वैदिक मन्त्र के प्रारम्भ में भगवान् को सम्बोधित करने के लिये प्रयुक्त दिव्य ध्वनि है।

चूँकि निर्विशेषवादी परमेश्वर श्रीकृष्ण को उनके असंख्य नामों के द्वारा पुकारने से भयभीत रहते हैं, अतः वे ओंकार का उच्चारण करते हैं, किन्तु उन्हें इसकी तनिक भी अनुभूति नहीं होती कि ओंकार श्रीकृष्ण का शब्द स्वरूप है, भगवद्भक्ति का क्षेत्र व्यापक है और जो इस भक्तिमार्ग को जानता है वह धन्य है, जो श्रीकृष्ण को नहीं जानते वे मोहग्रहस्त रहते हैं, अतः श्रीकृष्ण का ज्ञान मुक्ति है और उनके प्रति अज्ञान बन्धन है।

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ।।9।।

मैं पृथ्वी की आद्य सुगंध और अग्नि की ऊष्मा हूंँ, मैं समस्त जीवों का जीवन तथा तपस्वियों का तप हूंँ।

सज्जनों! पुण्य का अर्थ है जिसमें विकार न हो, अतः आद्य यानी इस जगत् में प्रत्येक वस्तु में कोई न कोई सुगंध होती है, यथा फूल की सुगंध या जल, पृथ्वी, अग्नि वायु आदि की सुगंध, समस्त वस्तुओं में व्याप्त अदूषित भौतिक गन्ध, जो आद्य सुगंध है, वह श्रीकृष्ण है, इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु का एक विशिष्ट स्वाद (रस) होता है और इस स्वाद को रसायनों के मिश्रण द्वारा बदला जा सकता है, अतः प्रत्येक मूल वस्तु में कोई न कोई गन्ध तथा स्वाद होता है, विभावसु का अर्थ अग्नि है, अग्नि के बिना न तो फैक्टरी चल सकती है और न भोजन पक सकता है, यह अग्नि श्रीकृष्ण है।

अग्नि का तेज (ऊष्मा) भी श्रीकृष्ण ही है, वैदिक चिकित्सा के अनुसार कुपच का कारण पेट में अग्नि की मंदता है, अतः पाचन तक के लिये अग्नि आवश्यक है, भगवद्भक्ति में हम इस बात से अवगत होते हैं कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा प्रत्येक सक्रिय तत्त्व, सारे रसायन तथा सारे भौतिक तत्त्व श्रीकृष्ण के कारण है, मनुष्य की आयु भी श्रीकृष्ण के कारण है, अतः श्रीकृष्ण की कृपा से ही मनुष्य अपने को दीर्घायु या अल्पजीवी बना सकता है, इसलिये भगवद्भक्ति प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय रहता है।

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।।10।।

हे पृथापुत्र! यह जान लो कि मैं ही समस्त जीवों का आदि बीज हूंँ, बुद्धिमानों की बुद्धि तथा समस्त तेजस्वी पुरूषों का तेज हूंँ।

सज्जनों! श्रीकृष्ण समस्त पदार्थो के बीज है, कई प्रकार के चर तथा अचर जीव है, पक्षी, पशु, मनुष्य तथा अन्य सजीव प्राणी चर है, पेड़ पौधे अचर है वे चल नहीं सकते, केवल खड़े रहते हैं, प्रत्येक जीव चौरासी लाख योनियों के अन्तर्गत है, जिनमें से कुछ चर है और कुछ अचर, किन्तु इन सबके जीवन के बीजस्वरूप श्रीकृष्ण है, जैसा कि वैदिक शास्त्रों में कहा गया है- ब्रह्म या परम सत्य वह है जिससे प्रत्येक वस्तु उदभूत है, श्रीकृष्ण परब्रह्म या परमात्मा है, ब्रह्म तो निर्विशेष है, किन्तु परब्रह्म साकार है, इसकी पुष्टि कठोपनिषद् (2/2/13) में इस प्रकार हुई है –

नित्यो नित्यानाम् चेतनश्चेतनानाम्।
एको बहूनां यो विदधाति कामान्।।

यानी, वे समस्त नित्यों के नित्य है, वे समस्त जीवों के परम जीव है और वे ही समस्त जीवों का पालन करने वाले हैं, मनुष्य बुद्धि के बिना कुछ नहीं कर सकता और श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि मैं ही समस्त बुद्धि का मूल हूंँ, जब तक मनुष्य बुद्धिमान नहीं होता वह भगवान् श्रीकृष्ण को नहीं समझ सकता, निर्विशेष ब्रह्म साकार रूप में आधारित है यह भगवद्गीता में कहा गया है, अतः आदि रूप में श्रीकृष्ण समस्त वस्तुओं के उद्गम है, वे मूल है, जिस प्रकार मूल सारे वृक्ष का पालन करता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण मूल होने के कारण इस जगत् के समस्त प्राणियों का पालन करते है

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरूद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।।11।।

मैं बलवानो का कामनाओं तथा इच्छा से रहित बल हूंँ, हे भरतश्रेष्ठ! (अर्जुन) मैं वह काम हूंँ जो धर्म के विरूद्ध नहीं है।

सज्जनों, बलवान पुरूष की शक्ति का उपयोग दुर्बलों की रक्षा के लिये होना चाहिये, व्यक्तिगत आक्रमण के लिये नहीं, इसी प्रकार धर्म-सम्मत मैथुन सन्तानोत्पति के लिये होना चाहिये, अन्य भोग के लिये नहीं, अतः माता-पिता का उत्तरदायित्व है कि वे अपनी सन्तान को भगवद्भक्त बनायें।

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ।।12।।

तुम जान लो कि मेरी शक्ति द्वारा सारे गुण प्रकट होते हैं, चाहे वे सतोगुण हों, रजोगुण हों या तमोगुण, एक प्रकार से मैं सब कुछ हूंँ, किन्तु हूंँ स्वतन्त्र, मैं प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं हूंँ, अपितु वे मेरे अधीन है।

सज्जनों! संसार के सारे भौतिक कार्यकलाप प्रकृति के गुणों के अधीन सम्पन्न होते हैं, यद्यपि प्रकृति के गुण परमेश्वर श्रीकृष्ण से उदभूत है, किन्तु भगवान् उनके अधीन नहीं होते, जैसे राज्य के नियमानुसार कोई दण्डित हो सकता है, किन्तु नियम बनाने वाला राजा उस नियम के अधीन नहीं होता, इसी तरह प्रकृति के सभी सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण भगवान् श्रीकृष्ण से उदभूत है, किन्तु श्रीकृष्ण प्रकृति के अधीन नहीं है, इसलिये वे निर्गुण है, जिसका तात्पर्य है कि सभी गुण उनसे उदभूत है, किन्तु ये उन्हें प्रभावित नहीं करते, यह भगवान् का विशेष लक्षण है।

त्रिभिर्गुणयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ।।13।।

तीन गुणों (सतो, रजो तथा तमो) के द्वारा मोहग्रहस्त यह सारा संसार मुझ गुणातीत तथा अविनाशी को नहीं जानता।

सज्जनों! सारा संसार प्रकृति के तीन गुणों से मोहित है, जो लोग इस प्रकार से तीन गुणों के द्वारा मोहित है वे नहीं जान सकते कि परमेश्वर श्रीकृष्ण इस प्रकृति से परे है, प्रत्येक जीव को प्रकृति के वशीभूत होकर एक विशेष प्रकार का शरीर मिलता है और तदनुसार उसे एक विशेष मानसिक (मनोवैज्ञानिक) तथा शारीरिक कार्य करना होता है।

प्रकृति के तीन गुणों के अन्तर्गत कार्य करने वाले मनुष्यों की चार श्रेणियाँ है, जो नितान्त सतोगुणी है वे ब्राह्मण, जो रजोगुणी है वे क्षत्रिय और जो रजोगुणी एवम् तमोगुणी दोनों हैं वे वैश्य कहलाते हैं, तथा जो नितान्त तमोगुणी है वे शूद्र कहलाते हैं, जो इनसे भी नीचे है वे पशु है, फिर ये उपाधियाँ स्थायी नहीं है, मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या कुछ भी हो सकता हूंँ, जो भी हो यह जीवन नश्वर है।

यद्यपि यह जीवन नश्वर है और हम नहीं जान पाते कि अगले जीवन में हम क्या होंगे, किन्तु माया के वश में रहकर हम अपने आपको देहात्मबुद्धि के द्वारा भारतीय या विदेशी, ब्राह्मण या क्षत्रिय हिन्दू या कोई और कहकर सोचते है, और यदि हम प्रकृति के गुणों में बँध जाते हैं तो हम उस भगवान् को भूल जाते हैं जो इन गुणों के मूल में है, अतः भगवान् का कहना है कि सारे जीव प्रकृति के इन गुणों द्वारा मोहित होकर यह नहीं समझ पाते कि इस संसार की पृष्ठभूमि में भगवान् है।

जीव कई प्रकार के है- जैसे मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी, जलचर, नभचर, कीट आदि, और इनमें से हर एक प्रकृति के वश में है और ये सभी दिव्यपुरूष भगवान् को भूल जाते हैं, जो रजोगुणी तथा तमोगुणी है, यहाँ तक कि जो सतोगुणी भी है वे भी परम सत्य के निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप से आगे नहीं बढ़ पाते, वे सब भगवान् के साक्षात् स्वरूप के समक्ष संभ्रमित हो जाते हैं, जिससे सारा सौंदर्य, ऐश्वर्य, ज्ञान, बल, यश तथा त्याग भरा है, जब सतोगुणी तक इस स्वरूप को नहीं समझ पाते तो उनसे क्या आशा की जाये जो रजोगुणी या तमोगुणी है? जो भगवद्भक्ति में स्थित है वे ही वास्तव में मुक्त हैं।

दैवी ह्योषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेंतां तरन्ति ते ।।14।।

प्रकृति के तीन गुणों वाली इस मेरी दैवी शक्ति को पार कर पाना कठिन है, किन्तु जो मेरे शरणागत हो जाते हैं वे सरलता से इसे पार कर जाते हैं।

सज्जनों! भगवान् की शक्तियाँ अनन्त है, और ये सारी शक्तियाँ दैवी है , क्यों? क्योंकि जीवात्मायें उनकी शक्तियों के अंश हैं इसलिये दैवी है, किन्तु भौतिक शक्ति के सम्पर्कमें रहने से उनकी परा शक्ति आच्छादित रहती है, इस प्रकार भौतिक शक्ति से आच्छादित होने के कारण मनुष्य उनके प्रभाव का अतिक्रमण नहीं कर पाता, जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि परा तथा अपरा शक्तियाँ भगवान् से उदभूत होने के कारण नित्य है।

जीव भगवान् की परा शक्ति से सम्बन्धित होते हैं, किन्तु अपरा शक्ति अर्थात् पदार्थ के द्वारा दूषित होने से उनका मोह भी नित्य होता है, इसलिये बद्धजीव नित्यबद्ध है, कोई भी उनके बद्ध होने की तिथि को नहीं बता सकता, फलस्वरूप प्रकृति के चंगुल से उसका छूट पाना अत्यन्त कठिन है, भले ही प्रकृति अपराशक्ति क्यों न हो, क्योंकि भौतिक शक्ति परमेश्वर की इच्छा के द्वारा संचालित होती है, जिसे लाँघ पाना जीव के लिये कठिन है।

भाई-बहनों! यहाँ पर अपरा भौतिक प्रकृति को दैवीप्रकृति कहा गया है, क्योंकि इसका सम्बन्ध दैवी है तथा इसका संचालन दैवी इच्छा से होता है, दैवी इच्छा स संचालित होने के कारण भौतिक प्रकृति अपरा होते हुये भी दृश्यजगत् के निर्माण तथा विनाश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इसी श्लोक को वेदों के द्वारा इसकी पुष्टि को समझने का कल फिर प्रयास करेंगे।

शेष जारी • • • • • • • •

जय श्री कृष्ण!

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