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टाटा,अडानी,बेदांत,सहित कई कारपोरेट के निजी विजली प्रोजेक्ट दिवालिया होने के हैं कगार पर, रिपोर्ट, जगत नारायण विश्वकर्मा

सोनभद्र।।

टाटा, अडानी, वेदांत सहित कई कारपोरेट घरानों के निजी बिजली प्रेजेक्ट दिवालिया होने के कगार पर हैं। जून 2017 के डाटा के अनुसार 34 थर्मल पावर प्रोजेक्ट भारी संकट के दौर से गुजर रहे हैं जिनमें 2 पब्लिक सेक्टर के भी हैं । इनका एनपीए कुल एनपीए(10 लाख करोड़) के 17.67 फीसद यानि 98799 करोड़ पहंुच गया है। इन्हीं बिजली कंपनियों को उबारने के नाम पर आरबीआई से पुनः लोन देने के लिए दबाव बनाने के चलते केंद्र सरकार व आरबीआई के बीच टकराव की एक प्रमुख वजह बनी।
आखिर निजी बिजली प्रोजेक्ट दिवालिया होने के कगार पर कैसे पहंुचे! जनकारी के लिए बता दें कि 30 जून 2016 के डाटा के अनुसार कुल बिजली क्षमता 3 लाख 3 हजार एक सौ अट्ठारह मेगावाट थी। जिसमें निजी 124995 मेगावाट व केंद्रीय 76296 मेगावाट व स्टेट 101825 मेगावाट है। 1990 में उदारीकरण के बाद बिजली क्षेत्र के निजी की दिशा में कदम उठाये गये। हालांकि शुरूआत में ही एनरान के दिवालिया हो जाने से इसमें उतनी तेजी नहीं लायी जा सकी। फिर भी 1998 के बाद पावर सेक्टर में व्यापक सुधार कर निजी क्षेत्र के लिए रास्ता तैयार किया गया। संसाधनों की कमी का बहाना कर पब्लिक पावर सेक्टर में पूंजी निवेश पर अघोषित रोक लगा दी गई, साथ ही पब्लिक सेक्टर के बिजली घरों को जानबूझ कर बर्बाद भी किया गया। बावजूद इसके अभी भी पब्लिक सेक्टर के बिजली घरों से सस्ती बिजली मिल रही है और मुनाफे पर चल रहे हैं। जबकि निजी बिजली घरों के लिए सार्वजनिक बैंकों से बेहद कम दरों पर लोन, सस्ती जमीन सहित अन्य सुविधायें मुहैया कराई गई। यही नहीं इन निजी बिजली कंपनियों से लागत की तुलना में बेहद मंहगी दरों से बिजली खरीदने के सरकार ने समझौते किये जिसके चलते सभी राज्यों के बिजली विभाग भारी घाटे में चले गये। दरअसल कारपोरेट बिजली कंपनियों ने खेल यह किया कि उनके द्वारा लागत को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया और ऐसा कर कारपोरेट घरानों द्वारा एक तरफ भारी मुनाफा कमाया गया और दूसरी तरफ घाटा दिखा कर बैंक लोन अदा करने से मुकर रहे हैं। मोदी सरकार बिजली संकट की दुहाई देकर इन्हें उबारने के लिए पुनः लोन देने का आरबीआई पर दबाव बना रही है। जबकि इन सभी बिजली घरों का अधिग्रहण कर बिजली संकट एवं एनपीए का संकट भी हल किया जा सकता है। साथ ही इन कंपनियों की जांच कराई जाये और इनके द्वारा जो अकूत मुनाफा कमाया गया है उससे रिकवरी भी कराई जा सकती है। लेकिन ऐसा करने के बजाय मोदी सरकार बैंको में जमा आम जनता की गाढ़ी कमाई को कारपोरेट घरानों की लूट के लिए खोलना चाहती है। अगर मोदी व राज्य सरकारें सरकार बिजली सेक्टर के निजीकरण में पूरी तौर पर कामयाब हुई तो आने वाले समय में उपभोक्ताओं को अत्याधिक मंहगी दरों(उत्तर प्रदेश में 15 रू0 प्रति यूनिट तक बिजली का प्रस्ताव है जिसे देर सबेर लगू करना ही है) से बिजली खरीदनी पड़ेगी।

रिपोर्ट जगतनारायण विश्वकर्मा

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