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कर्नाटक में तीन लोकसभा और दो विधानसभा सीटों के जीत के मायने,,,! !!के सी शर्मा!!

कर्नाटक। कर्नाटक में तीन लोकसभा और दो विधानसभा सीटों यानी कुल 5 सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन ने चार सीटें जीती हैं, जबकि भाजपा को केवल एक पर जीत हासिल हुई है
कर्नाटक में तीन लोकसभा और दो विधानसभा सीटों यानी कुल 5 सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन ने चार सीटें जीती हैं, जबकि भाजपा को केवल एक पर जीत हासिल हुई है। संयोग है कि ये नतीजे दीपावली के ठीक पहले आए और उधर पांच विधानसभा चुनावों की तैयारी भी शुरु हो गई है। इसलिए कोई इस जीत को कांग्रेस के लिए दीपावली का बोनस बता रहा है, तो कोई सेमीफाइनल में जीत करार दे रहा है। प्रमुख चुनाव हों या उपचुनाव, जीत तो जीत होती है और इसकी खुशी मनाना भी वाजिब है। हालांकि उपचुनावों का असर इतना व्यापक नहीं रहता है, जितना मीडिया में दिखाया जाता है। फिर भी कर्नाटक से आए ये नतीजे कुछ बातों का स्पष्ट संकेत देते हैं। सबसे पहली बात ये कि पिछले साढ़े चार वर्षों में भाजपा का हारना उसी तरह नामुमकिन बताया जाता है, जैसे 12 मुल्कों की पुलिस का डान को पकड़ना।
जबकि ये बात बार-बार गलत साबित हुई है। कई उपचुनावों में भाजपा हारी है, यहां तक कि उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में भी, जहां उसकी पकड़ मजबूत है। अब कर्नाटक में भी उसे बुरी तरह हार मिली है। केवल शिमोगा लोकसभा सीट, जो बी एस येदियुरप्पा ने खाली की थी, उस पर उनके बेटे राघवेन्द्र को जीत मिली है। इस सीट के बारे में येदियुरप्पा पहले से दावा कर रहे थे कि वे जीतेंगे और ऐसा ही हुआ। भाजपा ने अपनी इस लोकसभा सीट को बचाने में कामयाब हो गई है। लेकिन मांड्या और बेल्लारी उसे नहीं मिले। मांड्या तो पहले भी उसके पास नहीं थी, लेकिन बेल्लारी का उसके हाथ से निकलना बड़ी बात है।
बेल्लारी रेड्डी बंधुओं का गढ़ माना जाता है और यहां भाजपा नेता बी श्रीरामुलु की बहन और पूर्व सांसद जे शांता को भाजपा ने उम्मीदवार बनाया था। कांग्रेस और भाजपा में यहां कांटे की टक्कर थी। इस सीट से गठबंधन ने कांग्रेस के वीएस उगरप्पा को मैदान में उतारा था। कांग्रेस और जेडीएस दोनों के सौ से ज्यादा नेताओं ने यहां प्रचार किया था। पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा और पूर्व सी एम सिद्धारमैया भी प्रचार में जुटे थे। जिसका लाभ दिखा और भाजपा को ये सीट गंवानी पड़ी।
1999 में सोनिया गांधी ने इसी बेल्लारी सीट से सुषमा स्वराज को हराया था। इसलिए भी बेल्लारी की ये जीत उपचुनाव के नतीजों से निकला दूसरा बड़ा संकेत है। यह साबित करता है कि भाजपा का प्रभाव घटा है। उपचुनाव से तीसरी बड़ी बात यह समझ में आई है कि कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन का प्रयोग सफल रहा है। विधानसभा चुनावों के बाद कम सीटें मिलने के बावजूद भाजपा ने यहां जिस तरह आनन-फानन में सरकार बना ली थी, उससे उसकी सत्तालोलुपता जाहिर हो गई थी। हालांकिये उतावलापन उसके काम नहींआया और कांग्रेस-जेडीएस ने गठबंधन कर सरकार बनाई थी। सत्ता के लिए इस गठबंधन के टिकाऊ होने पर शुरु से शक किया जा रहा था। कई बार खबरें आईं कि कांग्रेस-जेडीएस के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। कभी पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बयान चर्चा का विषय बनते, कभी कुमार स्वामी का रोना खबरों में आता। ऐसी खबरें भी खूब निकलीं कि भाजपा कुछ विधायकों को तोड़कर अपनी सरकार फिर से बनाने की फिराक में है। खैर अब तक तो ऐसा कुछ नहीं हुआ। कर्नाटक में गठबंधन सरकार चल रही है और उपचुनावों में भी इस गठबंधन को कायम रख कांग्रेस, जेडीएस दोनों ने समझदारी दिखाई। इसका लाभ भी नजर आया।
कर्नाटक के नतीजों से 2019 के आम चुनावों में महागठबंधन की उम्मीदों को बल मिलने लगा है। जेडीएस तो कांग्रेस का साथ देने का इरादा जतला ही चुकी है, इन दोनों को साथ लाने में बीएसपी का बड़ा हाथ था। मायावती अभी विधानसभा चुनावों में तो कांग्रेस से अलग हैं, लेकिन शायद बाद में साथ आ जाएं। कर्नाटक में कुमार स्वामी के शपथग्रहण समारोह के मंच से विपक्षी दलों की एकजुटता की तस्वीर सामने आई थी। मुमकिन है, फिर वैसा ही कोई नजारा 2019 तक या उससे पहले दिखाई दे दे।

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