कर्मनाशा नदी वास्तव में कर्मावती नदी है’
उन्होंने आगे कहा कि मकर संक्रांति के पावन अवसर पर सोनभद्र में कर्मनाशा में स्नान कर अपने पुरखों और लोक मानस के पाप को धोया। वैदिक काल में जिस नदी को शापित किया गया, उसके लिए वह क्षमा प्रार्थी हैं कि इतने दिन तक वह कुछ नहीं कर सके। आज स्नान कर के वह जनमानस को यह बताना चाहते हैं कि जिसे कर्मनाशा कहा गया है, वह वास्तव में कर्मावती नदी है और आज इस कार्यक्रम के जरिए वह नदी को शापमुक्त घोषित करते हैं।
मकर संक्रांति पर्व पर स्नान और दान का विशेष महत्व माना जाता है। गंगा सहित देश की सभी प्रमुख नदियों में इस अवसर पर स्नान के लिए श्रद्धालुओं का रेला उमड़ पड़ता है, लेकिन कर्मनाशा नदी के शापित होने के पौराणिक आख्यानों के चलते लोग मकर संक्रांति जैसे विशेष पर्वों पर इस नदी में स्नान तो दूर, इसकी तरफ जाना भी पसंद नहीं करते। कर्मनाशा नदी (Karmanasa River) सोनभद्र से सटे बिहार के कैमूर जिले से चलकर सोनभद्र और चंदौली की कुल 192 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए गाज़ीपुर ज़िले के बाड़ा गांव और बिहार के बक्सर ज़िले के चौसा गांव के पास गंगा में मिल जाती है।
गंगा जैसी पवित्र नदी से जुड़ा होने के बावजूद जनमानस में इसके शापित समझते हैं। शुक्रवार को निलय उपाध्याय की अगुवाई में नदी के शापित होने का मिथक तोड़ने को लेकर किया गया प्रयास आगे चलकर कितना प्रभावी होगा यह तो वक्त बताएगा? लेकिन इस साहसिक पहल ने एक नई चर्चा तो छेड़ ही दी है।