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UP चुनावी दांव: मायावती OBC संग, अखिलेश ब्राह्मण नेताओं के साथ

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ब्राह्मण नेताओं के साथ मुलाकात कर आगामी चुनाव की तैयारियों पर चर्चा की है। वहीं, मायावती ने भी ओबीसी नेताओं के साथ मीटिंग की है।

Akhilesh Yadav move increased fear of BSP know Mayawati Nephew Akash Anand  said Be careful to party workers | UP Politics: अखिलेश यादव के इस कदम से  बढ़ा BSP का डर! आकाश

सपा का ब्राह्मण आउटरीच क्यों?

Akhilesh Yadav की पार्टी लंबे समय से “मुस्लिम-यादव” (MY) समीकरण पर आधारित मानी जाती रही है। लेकिन 2022 के बाद सपा ने अपने सामाजिक आधार को व्यापक बनाने की कोशिश तेज की है। इसी क्रम में:

  • ब्राह्मण नेताओं की बैठक आयोजित की गई।
  • संगठन में अगड़ी जातियों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
  • PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की व्याख्या में “अगड़ा” वर्ग को भी जोड़ने की राजनीतिक कोशिश दिखाई दे रही है।
  • भाजपा से कथित रूप से नाराज ब्राह्मण वोटरों को आकर्षित करने का प्रयास किया जा रहा है।

ब्राह्मण वोट कितना महत्वपूर्ण है?

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण आबादी लगभग 10-12% मानी जाती है। कई सीटों पर उनका प्रभाव निर्णायक हो सकता है। हालांकि यह भी सच है कि ब्राह्मण वोट एकसमान नहीं होता और अलग-अलग क्षेत्रों में उसका राजनीतिक व्यवहार अलग रहता है।

बसपा की ओबीसी रणनीति

दूसरी ओर Mayawati भी ओबीसी वोटरों को साधने की कोशिश कर रही हैं।

  • 2007 में बसपा ने दलित-ब्राह्मण और अन्य सामाजिक समूहों के गठजोड़ के दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया था।
  • अब पार्टी फिर से गैर-यादव ओबीसी वोटरों पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
  • बसपा का लक्ष्य उन वोटरों को आकर्षित करना है जो भाजपा और सपा दोनों से असंतुष्ट हो सकते हैं।

भाजपा की स्थिति

Bharatiya Janata Party का सामाजिक गठबंधन वर्तमान में काफी व्यापक माना जाता है, जिसमें ब्राह्मण, अन्य सवर्ण, गैर-यादव ओबीसी और कुछ दलित वर्ग शामिल हैं। इसलिए विपक्षी दलों की रणनीति भाजपा के इस वोट बैंक में सेंध लगाने की है।

2027 की संभावित लड़ाई

यदि वर्तमान संकेतों को देखें तो:

  • सपा: PDA के साथ ब्राह्मण और अन्य अगड़ी जातियों को जोड़ने की कोशिश।
  • बसपा: ओबीसी और पारंपरिक दलित आधार को पुनर्जीवित करने की कोशिश।
  • भाजपा: अपने मौजूदा व्यापक सामाजिक गठबंधन को बनाए रखने की रणनीति।

हालांकि चुनाव में अभी काफी समय है। उम्मीदवार चयन, स्थानीय मुद्दे, गठबंधन, सरकार के कामकाज और चुनावी माहौल जैसे कई कारक अंतिम परिणाम को प्रभावित करेंगे। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ब्राह्मण सम्मेलन या ओबीसी बैठकों का चुनावी नतीजों पर कितना असर पड़ेगा।

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