India's No.#1 Hindi News Channel

राजा और वैश्य ने किया कठोर तप, तब धरती पर प्रकट हुई मां भगवती

उत्तर प्रदेश में बलिया जिले से सटे सुरहा ताल के किनारे मां भगवती धरती पर आईं थीं. यह स्थान आज भी बलिया जिला मुख्यालय से करीब पांच किमी दूर गोरखपुर रोड पर हनुमानगंज के ब्रह्मइन गांव में है.Navratri Special 2025: राजा और वैश्य दोनों ने किया 1 साल तक कठोर तप, तब धरती पर इस जगह पहली बार प्रकट हुई थीं मां भगवती

इस साल शारदीय नवरात्रि सोमवार से शुरू हो रही है. आज हम आपको उस स्थान के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां पहली बार मां भगवती धरती पर आईं थीं. दुर्गा सप्तशती, मार्कंडेय पुराण, वाराह पुराण और देवी भागवत महापुराण के अनुसार, उत्तर प्रदेश में बलिया जिले से सटे सुरहा ताल के किनारे मां ने धरती पर धरती पर अपने कदमम रखे थे.

यह स्थान आज भी बलिया जिला मुख्यालय से करीब पांच किमी दूर गोरखपुर रोड पर हनुमानगंज के ब्रह्मइन गांव में है. एक कथा के मुताबिक सतयुग में राजा सूरत को यवन राजाओं ने हरा दिया. बुरी तरह से घायल अवस्था में उनके सैनिक उन्हें बचाकर जंगल में आ गए थे. इस दौरान राजा सूरत को जोर की प्यास लगी तो सैनिकों ने उस जंगल में एक छोटे से गड्ढे से पानी लाकर पिला दिया.

राजा ने गड्ढे में छलांग लगा दी

उस पानी को पीने भर से ही राजा के सारे घाव भर गए. यह देख राजा सूरत अचंभित हुए और सैनिकों के साथ उस स्थान पर पहुंचे, जहां से सैनिकों ने पानी लिया था. वहां जाने पर राजा ने उस गड्ढे में छलांग लगा दी और जब वह बाहर निकले तो उनका पूरा शरीर सुंदर हो गया. उस समय राजा के मन में विचार आया कि यह निश्चित रूप से कोई पवित्र स्थान है.

वहां जाने पर राजा ने उस गड्ढे में छलांग लगा दी और जब वह बाहर निकले तो उनका पूरा शरीर सुंदर हो गया. उस समय राजा के मन में विचार आया कि यह निश्चित रूप से कोई पवित्र स्थान है. उन्होंने सैनिकों का साथ छोड़ा और उस स्थान पर अकेले विचरण करने लगे. कुछ दूर चलने पर उन्होंने मेघा ऋषि का आश्रम दिखाई दिया. जहां सर्वत्र बसंत की छंटा बिखरी हुई थी.

ऋषि के आश्रम में पहुंचे राजा

यहां तक कि हिंसक शेर, बाघ, भालू भी अहिंसक जीव के रूप में विचरण करते नजर आए. यह देखकर राजा को आश्चर्य हुआ और वह आश्रम में पहुंचकर ऋषि से इस चमत्कार के बारे में पूछा और वहीं रहने लगे. कुछ दिनों बाद एक संदीप नामक वैश्य भी वहां पहुंचा. पता चला कि उसके बंधु बांधवों ने उसकी सारी संपत्ति छीन कर उसे बेघर कर दिया है.

उस वैश्य की कहानी सुनकर मेघा ऋषि ने उन्हें अपराजिता देवी की उपासना करने की सलाह दी. इसके बाद राजा और वैश्य ने 1 वर्ष तक निराहार रहते हुए तप शुरू कर दिया. फिर मां भगवती साक्षात प्रकट हुईं और दोनों को मनचाहा वर दिया था. फिर माता की कृपा से राजा और वैश्य ने इस स्थान पर विशाल यज्ञ का आयोजन किया.

जलाशय को गंगा से जोड़ दिया

इसमें इस सृष्टि के ऋषि-मुनि, गंधर्व, किन्नर, देव एवं देवियां पहुंची थीं. ऐसे में राजा ने सभी के ठहरने के लिए उत्तम प्रबंध किया और पानी की व्यवस्था के लिए एक बड़ा जलाशय बनवाया. उस जलाशय को शुद्ध जल पहुंचाने के लिए उसे गंगा से जोड़ दिया. ऋषि मुनियों की सुविधा के लिए राजा ने जो जलाशय बनवाया था. आज भी वह उसी रूप में मौजूद है.

राजा सूरत के ही नाम पर इस जलाशय को सुरहा ताल कहा जाता है. इसी प्रकार मेघा ऋषि के जिस आश्रम की बात दुर्गा सप्तशती में कही गई है. उस स्थान को वसंतपुर कहा जाता है. यहां आज भी 12 महीने पेड़ के पत्ते सूखते नहीं है. इसी प्रकार जहां पर मां भगवती ने राजा सूरत को दर्शन दिया था, वह स्थान ब्रह्माइन के रूप में मौजूद है. इस स्थान पर मां भगवती का भव्य मंदिर बना हुआ है.

राजा ने बनवाए थे पांच मंदिर

वहीं सुरहा ताल को गंगा से जोड़ने के लिए जिस नहर का निर्माण कराया गया था, उसका नाम कुष्टहर था, जो आज अपभ्रंस रूप में कटहर नाला कहा जाता है. देवी पुराण और मार्कंडेय पुराणा की कथा के मुताबिक यज्ञ से पूर्व राजा सूरत ने कुल पांच मंदिर बनवाए थे. इसमें एक तो ब्रह्माइन मंदिर तो है ही, इसके अलावा सुरहा ताल के दूसरी ओर शंकरपुर में देवी मंदिर और तीन शिव मंदिर बनखंडी नाथ, अश्वनी नाथ एवं शोक हरण नाथ मंदिर शामिल है. यह पांचों मंदिर अपने भव्य स्वरुप में आज भी मौजूद हैं.

मान्यता है कि ब्रह्माइन मंदिर में भगवती के दर्शन के बाद जो भक्त बाकी चारों मंदिरों में जाकर अपनी अर्जी रखते हैं, उनकी मनौती शीघ्र पूरी हो जाती है.

अन्य अपडेट लगातार पाने के लिए हमारा फेसबुक पेज लाइक करें| आप हमें ट्वीटर पर भी फॉलो कर सकते हैं| आप हमारा एंड्राइड ऐप भी डाउनलोड कर सकते है|

Comments are closed.